
आवास मित्रों के तबादले में आखिर किसका ‘खेल’? जनपद CEO पर उठे सवाल, शिकायत के बाद जांच भी उसी सिस्टम में और नतीजा ‘क्लीन चिट’!
आवास मित्रों का स्थानांतरण नहीं किया जा सकता, अगर उनके द्वारा लापरवाही या फिर कार्यों में अनियमितता किया जाता है तो, हटाया जाता है – जिला सीईओ मुकेश रावते

तपेश्वर चंद्रा/गौरेला। जनपद पंचायत गौरेला में प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़े आवास मित्रों के तबादले का मामला अब सीधे प्रशासनिक पारदर्शिता के कटघरे में खड़ा है। भदौरा के आवास मित्र को सधवानी और सधवानी के आवास मित्र को भदौरा भेजने के आदेश को लेकर शिकायतकर्ता ने नियमों पर सवाल उठाते हुए CM हेल्पलाइन का दरवाजा खटखटाया। लेकिन शिकायत के बाद मामला जिस दिशा में गया, उसने विवाद को और हवा दे दी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जिस निर्णय को लेकर शिकायत की गई, उसी प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर उसकी जांच हुई और फिर मामले में क्लीन चिट दे दी गई। अब सवाल यह नहीं है कि केवल तबादला क्यों हुआ, बल्कि सवाल यह है कि शिकायत की जांच की निष्पक्षता का पैमाना आखिर क्या था?


शिकायत उन्हीं के फैसले पर, जांच भी उसी व्यवस्था में—फिर ‘निष्पक्ष’ कौन?
अगर शिकायत जनपद CEO के आदेश या निर्णय को लेकर है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उसी प्रशासनिक स्तर पर हुई जांच शिकायतकर्ता के लिए स्वतंत्र जांच मानी जा सकती है? शिकायतकर्ता की ओर से यही आपत्ति उठाई जा रही है। आखिर जांच किस अधिकारी ने की? उसे जांच का अधिकार किस आदेश से मिला? क्या संबंधित अधिकारी से स्वतंत्र स्तर पर जांच कराई गई? क्या जिला पंचायत CEO को जांच में शामिल किया गया? क्या शिकायतकर्ता और दोनों आवास मित्रों के बयान दर्ज किए गए? यदि इन सवालों के जवाब रिकॉर्ड में हैं तो उन्हें सार्वजनिक करने में आखिर संकोच क्यों?

आवास मित्रों का सामान्य तबादला नहीं तो फिर यह ‘विशेष’ आदेश क्यों?
मामले में जिला पंचायत स्तर से सामने आई जानकारी के अनुसार आवास मित्रों के सामान्य स्थानांतरण को लेकर ही सवाल मौजूद हैं। यदि किसी आवास मित्र के विरुद्ध अनियमितता या लापरवाही पाई जाती है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे में गौरेला में दो आवास मित्रों को एक-दूसरे के क्षेत्र में भेजे जाने के पीछे कौन-सी प्रशासनिक मजबूरी या नियम लागू हुआ, यह सबसे बड़ा दस्तावेजी सवाल है। क्या इस तबादले का कोई स्पष्ट कारण आदेश में दर्ज है? क्या सक्षम अधिकारी की स्वीकृति ली गई? क्या जिला पंचायत को प्रस्ताव भेजा गया? या फिर पूरा निर्णय जनपद स्तर पर ही हो गया?
अगर गलती थी तो कार्रवाई कहां? और गलती नहीं थी तो तबादला क्यों?
यह मामला यहीं से और पेचीदा होता है। यदि दोनों आवास मित्रों के कार्य में कोई गंभीर अनियमितता थी तो क्या उनके खिलाफ कोई नोटिस, जांच या कार्रवाई हुई? यदि नहीं हुई तो उन्हें एक-दूसरे के स्थान पर भेजने का कारण क्या था? और यदि दोनों सामान्य रूप से काम कर रहे थे तो फिर इस तरह के तबादले की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? इन सवालों का जवाब किसी बयान से नहीं, बल्कि मूल आदेश और संबंधित रिकॉर्ड से मिलना चाहिए।
CM हेल्पलाइन में शिकायत, फिर ‘क्लीन चिट’—लेकिन जांच रिपोर्ट कहां?
शिकायतकर्ता का दावा है कि CM हेल्पलाइन शिकायत के बाद मामले में क्लीन चिट दे दी गई। लेकिन अब सवाल है कि क्लीन चिट किस आधार पर? क्या जांच में सिर्फ अधिकारी का पक्ष लिया गया या शिकायतकर्ता की आपत्ति भी रिकॉर्ड की गई? क्या तबादले से संबंधित नियमों का परीक्षण हुआ? क्या जिला पंचायत से लिखित राय ली गई? क्या संबंधित आवास मित्रों से जवाब मांगा गया? क्या स्थानांतरण आदेश जारी करने की सक्षम शक्ति का परीक्षण किया गया? अगर यह सब हुआ है तो जांच रिपोर्ट ही सबसे बड़ा जवाब है।
कागजों में सब सही है तो कागज सामने लाने में परेशानी क्यों?
यह विवाद किसी आरोप को सही या गलत ठहराने से पहले रिकॉर्ड सामने रखने की मांग करता है। स्थानांतरण आदेश सार्वजनिक हो, जांच रिपोर्ट सामने आए, संबंधित नियम बताए जाएं और यह स्पष्ट किया जाए कि आदेश किस सक्षम प्राधिकारी के अधिकार के तहत जारी हुआ। इससे न केवल शिकायतकर्ता के सवालों का जवाब मिलेगा, बल्कि प्रशासन पर उठ रहे संदेह भी दूर हो सकते हैं।
जनपद की कार्यप्रणाली पर पहले से सवाल, अब फिर कटघरे में व्यवस्था…!
गौरेला जनपद पंचायत की कार्यप्रणाली को लेकर पहले भी शिकायतें और आरोप सामने आते रहे हैं। जिला पंचायत CEO द्वारा सात सचिवों के विरुद्ध FIR दर्ज कराने के आदेश की बात भी सामने आई थी, जबकि आदेश के बाद FIR की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए गए। अब आवास मित्रों के तबादले और शिकायत की जांच का मामला सामने आने से जनपद कार्यालय की निर्णय प्रक्रिया और जवाबदेही फिर चर्चा में है।
अब जिला पंचायत की परीक्षा—जांच की जांच होगी या मामला फाइलों में दब जाएगा?
मामले में अब गेंद जिला पंचायत और संबंधित उच्च अधिकारियों के पाले में है। यदि स्थानांतरण नियमसम्मत था तो नियम और आदेश सार्वजनिक किए जाएं। यदि शिकायत की जांच निष्पक्ष थी तो जांच रिपोर्ट सामने लाई जाए। यदि कोई सक्षम स्वीकृति ली गई थी तो उसका रिकॉर्ड दिखाया जाए। और यदि शिकायत की जांच उसी प्रशासनिक स्तर पर हुई जिस पर शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया था, तो इस प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा पर भी विचार किया जाना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल: तबादला किस नियम से और क्लीन चिट किस जांच से?
भदौरा से सधवानी और सधवानी से भदौरा—दो नाम, दो स्थान और एक प्रशासनिक आदेश। लेकिन अब इस आदेश के पीछे का नियम, कारण और स्वीकृति सवालों के घेरे में है। उससे भी बड़ा सवाल है शिकायत के बाद हुई जांच। क्या शिकायत की निष्पक्ष जांच हुई या शिकायत और जांच दोनों एक ही प्रशासनिक दायरे में सिमटकर रह गए?
अब इस पूरे मामले का सच किसी बयान से नहीं, बल्कि स्थानांतरण आदेश, संबंधित नियम, CM हेल्पलाइन जांच रिपोर्ट और सक्षम अधिकारी की स्वीकृति से सामने आएगा। यही दस्तावेज तय करेंगे कि मामला सामान्य प्रशासनिक निर्णय था या फिर जिस प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं, उसमें वास्तव में कुछ ऐसा है जिसकी स्वतंत्र जांच जरूरी है।













